चार साल, सैकड़ों हेडलाइंस, हजारों घंटे की टीवी डिबेट और अनगिनत सोशल मीडिया पोस्ट—अभिनेत्री रिया चक्रवर्ती के लिए यह सफर किसी बुरे सपने से कम नहीं रहा। लेकिन आखिरकार, सीबीआई (CBI) ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट कर दिया कि सुशांत सिंह राजपूत की मौत आत्महत्या थी और इसमें रिया या किसी अन्य बाहरी व्यक्ति की संलिप्तता का कोई सबूत नहीं मिला। इस फैसले के साथ ही एक और कड़वा सच सामने आया—कैसे भारतीय मीडिया ने इस मामले को सनसनीखेज बनाकर TRP का खेल खेला, और कैसे इस पूरे घटनाक्रम में सरकार की भूमिका भी छिपी रही।
मीडिया का ड्रामा: TRP के लिए ‘विलेन’ बनाना जरूरी था
2020 में जब सुशांत सिंह राजपूत की दुखद मौत हुई, तो पूरा देश सकते में था। एक टैलेंटेड अभिनेता की मौत को न्याय दिलाने के नाम पर मीडिया ने एक अनोखा ‘रियलिटी शो’ बना दिया। जांच एजेंसियों से पहले मीडिया ट्रायल शुरू हो गया। रिया चक्रवर्ती को ऐसे पेश किया गया जैसे वह कोई खूंखार अपराधी हों।
“गिरफ्तारी कब होगी?”
“रिया ड्रग माफिया की रानी?”
“सुशांत को किसने मारा?”
हर दिन, हर चैनल पर चीख-चीखकर सवाल उठाए गए। टीवी डिबेट्स में बैठे कथित एक्सपर्ट्स ने बिना किसी पुख्ता सबूत के राय देनी शुरू कर दी। सोशल मीडिया पर #JusticeForSSR ट्रेंड चलाया गया, लेकिन धीरे-धीरे यह कैंपेन #ArrestRhea में बदल गया।
सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि इस पूरे तमाशे के बीच सुशांत की मौत की असली वजह से ध्यान पूरी तरह भटका दिया गया। बॉलीवुड में नेपोटिज्म, मानसिक स्वास्थ्य, इंडस्ट्री के डार्क साइड जैसे गंभीर मुद्दों की चर्चा होनी चाहिए थी, लेकिन फोकस सिर्फ इस पर था कि रिया को किस तरह दोषी साबित किया जाए।
सरकार की भूमिका: राजनीति और फायदा उठाने का खेल
यह संयोग नहीं था कि सुशांत सिंह राजपूत का केस बिहार चुनावों के ठीक पहले सुर्खियों में आया। बिहार की राजनीति में इसे एक बड़े मुद्दे की तरह उछाला गया। केंद्र सरकार के करीबी माने जाने वाले मीडिया हाउसों ने इस केस को लगातार हाईलाइट किया और रिया चक्रवर्ती को टारगेट किया गया।
जब बिहार पुलिस ने मुंबई में जांच करने की कोशिश की, तब यह साफ हो गया कि मामला सिर्फ न्याय तक सीमित नहीं था, बल्कि इसमें राजनीतिक एजेंडा भी जुड़ गया था। महाराष्ट्र और बिहार की सरकारों के बीच तनातनी देखने को मिली। बाद में, सीबीआई को केस सौंप दिया गया।
इस दौरान नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB) ने भी एंट्री मारी और रिया को ड्रग्स मामले में गिरफ्तार किया गया। उस समय इस गिरफ्तारी को ऐसे दिखाया गया जैसे इससे सुशांत की मौत की गुत्थी सुलझ जाएगी। लेकिन असल में, इसका केस से कोई सीधा संबंध नहीं था।
रिया चक्रवर्ती की जीत, लेकिन क्या यह न्याय है?
चार साल बाद, जब सीबीआई ने अपनी क्लोजर रिपोर्ट में साफ किया कि सुशांत की मौत आत्महत्या थी और किसी भी तरह की साजिश का कोई सबूत नहीं मिला, तो मीडिया और राजनेताओं ने चुप्पी साध ली। जो एंकर कभी रिया को ‘विषकन्या’ कहते नहीं थकते थे, वे अब इस खबर पर चुप्पी साधे बैठे हैं।
रिया ने अपने जीवन के कीमती साल इस झूठे आरोपों की लड़ाई में खो दिए। उन्हें जेल में रहना पड़ा, सोशल मीडिया पर ट्रोलिंग झेलनी पड़ी, करियर ठप हो गया।
अब बड़ा सवाल यह है कि क्या भारतीय मीडिया इस ‘विच हंट’ के लिए जिम्मेदारी लेगा? क्या सरकार इस मामले का राजनीतिकरण करने के लिए माफी मांगेगी? जवाब शायद ‘नहीं’ होगा।
सबक जो हमें सीखने चाहिए
- मीडिया ट्रायल खतरनाक होता है: किसी भी केस में न्यायालय और जांच एजेंसियों को फैसला करने देना चाहिए, न कि न्यूज चैनलों को।
- राजनीति हर मुद्दे का फायदा उठाती है: सुशांत केस में न्याय से ज्यादा राजनीति हावी थी।
- मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान देना जरूरी: सुशांत सिंह राजपूत की मौत का असली मुद्दा डिप्रेशन और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ा था, लेकिन इसे भुला दिया गया।
रिया चक्रवर्ती के लिए यह ‘क्लीन चिट’ उनकी इमेज सुधार सकती है, लेकिन जो मानसिक और सामाजिक नुकसान उन्होंने झेला, उसकी भरपाई शायद कभी नहीं हो सकेगी। अब वक्त है कि हम एक जिम्मेदार समाज बनें और न्याय की मांग सिर्फ ट्रेंड्स और शोरगुल के लिए न करें, बल्कि सच में न्याय को प्राथमिकता दें।