मुस्लिम शव दफनाने पर आपत्ती वाली याचिका सुप्रीम कोर्ट से खारिज।

नई दिल्ली : देश और दुनिया की तरक्की कोरोना वायरस के संक्रमण के प्रभाव से रुकी हुई है। संक्रमित बीमारी किसी की जाति धर्म रंग स्वरूप देखकर प्रभावित नहीं करता है देश में कोरोना वायरस के नए संक्रमण और उसके प्रभाव से मृतकों की संख्या बढ़ती जा रही है। इस बीमारी के प्रकोप से कोई धर्म जाति अछूता नहीं है।

मुंबई के बांद्रा निवासी प्रदीप गांधी ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की. उस याचिका में उन्होंने कहा कि कोविड-19 से ग्रसित होकर मरने वाले मुसलमान शवों को कब्रिस्तान में दफनाने की अनुमति पर रोक लगाई जाए। उन्होंने मुंबई के तीन कब्रिस्तान 1. मुस्लिम कोकनी क़ब्रिस्तान 2.खोजा सुन्नत जमाअत क़ब्रिस्तान 3.खोजा इस्ना अशरी जमाअत क़ब्रिस्तान में शवों को दफनाने पर पाबंदी की मांग की।

याचिकाकर्ता का कहना है कि कोरोना वायरस से ग्रसित दफ़न शवों से कब्रिस्तान के आसपास के इलाकों में कोरोना वायरस का संक्रमण फैलने का ख़तरा है। जमीयत उलेमा ए हिंद के वरिष्ठ अधिवक्ता नकुल दीवान और एडवोकेट ओन रिकार्ड एजाज़ मक़बूल ने बहस करते हुए अदालत को बताया कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (W.H.O) ने खुद अपने बयान में कहा है कि मरने के बाद अगर शव को ज़मीन में दफन कर दिया जाए तो इससे वायरस फैलने का खतरा1 नहीं रहता है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन और भारतीय स्वास्थ्य मंत्रालय समेत अन्य देश की अन्य स्वस्थ संस्थानों द्वारा जारी गाइडलाइन का पालन करते हुए शव को दफनाया जा रहा है. सुप्रीम कोर्ट ने याचिका को निराधार पाया और खारिज कर दिया। इससे पहले मुंबई हाई कोर्ट शव दफनाने की पाबंदी पर रोक वाली याचिका पर राहत देने से इंकार कर चुका है।

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