प्रवासी मजदूरों से लबालब भरा ट्रक की टक्कर। 24 लोगों ने गवाही अपनी जिंदगी।

उत्तर प्रदेश – राजस्थान से गाजर मुली जैसे 85 प्रवासी मजदूरों को लेकर गोरखपुर, बिहार, झारखण्ड की तरफ निकला एक ट्रक को यूपी के औरैया में सामने से आ रही ट्रक ने टक्कर मार दी। टक्कर इतना तेज था कि तुरन्त दो दर्जन लोगों ने दम तोड़ दिया बाकी सब बुरी तरह घायल हो गए। जिनका इलाज सैफई में चल रहा है।

घटना आज सुबह 3 से 4 बजे के बीच की बताई जा रही है। ये सभी लोग मजदूर थे। मारे गए। किसी को क्या फर्क पड़ता है। सरकारें ट्विटर पर आकर वही पुरानी क्रिया दोहरा रही है। संवेदनाएं व्यक्त कर रही हैं। अगर ज्यादा किरकिरी हुई। दो चार लाख मुआवजा देने की घोषणा भी हो जाएगी। सब शांत हो जाएगा। वैसे ही जैसे ट्रेन की पटरी पर कटे मजदूरों के साथ हुआ था।

प्रवासी मजदूरों से लबालब भरा ट्रक की टक्कर। 24 लोगों ने गवाही अपनी जिंदगी।

इन मजदूरों का कसूर क्या था। क्या इनका मजदूर होना गुनाह था। अमीर होते तो फलाइट या ट्रेनों कि व्यवस्था कर दी जाती। सरकार सकुशल उनको उनके दरवाजे तक छुड़वा देती। पर ये तो मजदूर थे, इनकी क्या औकात। पैदल चले या गजर मुली जैसे ट्रकों में भरकर जाए। सरकार को इनके बारे में सोचने क्या जरूरत!

करोना वायरस के संक्रमण से दुनिया के तकरीबन एक तिहाई से ज्यादा देश जूझ रहे हैं। लेकिन पूरी दुनिया में मजदूरों का भारत जैसा शोषण कहीं नहीं हो रहा है। नेशनल हाईवे से लेकर रेलवे ट्रैक के ऊपर मजदूर भारी संख्या में गांव की तरफ पलायन करते दिखाई दे रहे हैं। सरकारें खामोश है। मजदूर खुशी से गांव नहीं जा रहे हैं। नोटबंदी के जैसा अचानक लॉक डाउन के बाद देश की सारी क्रियाओं पर ब्रेक लग गया।

मजदूर जिन कंपनियों में कार्य कर रहे थे उन पर ताले लटका दिए गए। जिस तरह नोटबंदी से पहले किसी को कुछ पता नहीं था उसी प्रकार लाक डाउन की भी किसी को कानों कान खबर नहीं थी। हालांकि कोरोना वायरस की तेजी से बढ़ते संक्रमण की जानकारी से कोई अनजान भी नहीं था। पर जनता इसलिए अस्वस्त थी क्योंकि जनता कर्फ्यू से 2 दिन पहले ही भारतीय हेल्थ मिनिस्टर का बेशर्मी भरा बयान आया था कि कोरोना वायरस कोई महामारी नहीं है, इससे डरने की जरूरत नहीं है। लेकिन देश के प्रधानमंत्री इस बीमारी को गंभीर बताते हुए देश के सभी गतिविधियों पर ब्रेक लगा देते हैं।

बस इसके बाद से प्रवासी मजदूरों के विपत्ति भरी कहानी की शुरुआत होती है। प्रवासी मजदूर दो वक्त के निवालों के लिए भटकने लगते हैं। सड़कों पर पुलिस उन्हें बेरहमी से पिटती है। लेकिन बेशर्म सरकार और मतवाली पुलिस को कौन समझाए कि यह प्रवासी मजदूर भूखे पेट लाक डाउन का पालन घर में बैठ कर कैसे करें। उस घर में जो किराया पर लिया है। लाक डाउन के बाद सरकार खामोशी अख्तियार कर ली जिस के बाद मजदूरों पर तनाव और बढ़ गया। नन्हे मुन्ने बच्चे भूख से बिलखने लगे तो मकान मालिक किराए के लिए परेशान करने लगा।

अंत में मजदूर शहरों से हजारों मील दूर अपने गांव की तरफ पैदल ही पलायन करना शुरू कर दिये। लेकिन सरकार अपनी घनघोर निद्रा से नहीं उठी। जब उठी तो उसे शराब का ख्याल आया। फिर क्या था। लाक डाउन में कुछ छूट के साथ शराब से सारी पाबंदियां हटा ली। पर पैदल पलायन कर रहे मजदूरों के दर्द का कोई समाधान नहीं किया। अब कुछ स्पेशल ट्रेनों के साथ निजी परिवहनों की संचालन का शुरुआत हुआ है। लेकिन यह व्यवस्था सभी को नसीब नहीं हो रहा है क्योंकि निजी परिवहन यात्रा के लिए मोटी रकम वसूल रहे हैं तो सरकार भी बिना टिकट किसी को प्रदेश वापसी नहीं करा रही है।

इसलिए अब भी प्रवासी मजदूरों का पैदल का सफ़र थमा नहीं है। राजस्थान से पचासी मजदूरों को लेकर यूपी, बिहार व झारखंड के लिए रवाना एक ट्रक को उत्तर प्रदेश के औरैया में सामने से तीब्र गति से आ रहे दूसरे ट्रक ने जबरदस्त टक्कर मार दी। मौके पर ही 24 लोगों ने दम तोड़ दिया और बाकी सभी बुरी तरह घायल हो गये जिनका इलाज उत्तर प्रदेश के सैफई में चल रहा है। इन मौतों की जिम्मेदारी कोई भी अपने सर लेने के लिए तैयार नहीं है। अगर देखा जाए तो नीचे से लेकर ऊपर तक सिस्टम की खामियां दिखाई देती है। लेकिन वो सब बड़े लोग हैं। इनकी अपनी जिम्मेदारियों के प्रति कोई जवाबदेही नहीं है। यह वह लोग हैं जो कसूरवार होते हुए भी निर्दोष होते हैं।

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