परिवहन कानून और सरकार की मानसिकता!

नई दिल्ली – एक बात तो है. जब हाथ में पूर्ण बहुमत का पॉवर हो तो बिना किसी चर्चा के कोई भी कानून पास किया जा सकता है। लोकतंत्र के मर्यादाओं को ताक पर रखा जा सकता है। पिछले दो कार्यकाल से बीजेपी की मोदी नेतृत्व वाली सरकार यही कर रही है। दोनो सदनों में बहुमत होने के कारण कोई भी कानून बिना किसी चर्चा के जनता पर थोप देती है।

नोटबंदी हो या जीएसटी (GST) लागू करने का फैसला, तीन तलाक़ हो या जम्मू कश्मीर से धारा 370 हटाने का कानून या किसानों के लिए बना नियम. सबकी अपनी – अपनी नाकामियां है। सबकुछ सकुशल इस लिए लग रहा है कि आपकी आवाज उठाने वाली मीडिया पर भी सरकार ने अपना अधिपय स्थापित कर लिया है। वास्तव में आप तक सही सूचनाएं पहुंच नही पा रही है। खबरों के नाम पर हिंदू मुस्लिम कर टीवी और अखबार आपको गुमराह कर रहे है।

खैर सरकार एक और परिवहन नियम बनाया है कि अगर किसी वाहन चालक से दुर्घटना हो जाती है और वह वहा से फरार हो जाता है साथ ही दुर्घटना ग्रस्त व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है तो चालक पर 7 लाख तक का जुर्माना और 10 वर्ष की कारावास की सजा हो सकती है। भारत में हर रोज सैकड़ों रोड़ दुर्घटनाएं होती है लोग मारे जाते है इस लिहाज और सरकार के नजरिए से देखें तो यह कानून बहुत ही अच्छा है सरकार का दावा है कि इस कानून की वजह से सैकड़ों जाने हर रोज बच सकेगी।

लेकिन देश में अधिकांश दुर्घटनाएं खराब टूटी फूटी सड़कों के कारण होती है इसमें ड्राइवर और सड़क पर चलने वाले राहगीरों की गलती नही होता है खराब सड़कों के कारण होने वाली दुर्घटनाओं की जिम्मेदारी कौन लेगा? क्या सड़क परिवहन मंत्री 10 वर्ष के लिए जेल जाएंगे? केंद्र को यह तय करना चाहिए। परिवहन विभाग की गलती का खामियाजा ड्राइवर क्यों भुगतेगें। दूसरों के लिए नियम कानून बनना आसान बात है।

देश भर में इस कानून के विरोध में ड्राइवरों ने विरोध प्रदर्शन किया जिसके बाद एक बार फिर मोदी सरकार इस कानून को लागू करने से अपना पैर पीछे खींच लिया है। सड़क दुर्घटनाएं कम करने के लिए कानून की नहीं अच्छी टिकाऊ सड़क बनाने की जरूरत है। परिवहन विभाग को चाहिए की पूरे देश में बड़ी छोटी वाहनों के लिए अलग अलग सड़क का निर्माण करे पैदल चलने वालें राहगीरों के लिए भी अलग सड़क की व्यवस्था हो जिससे दुर्घटना होने की संभावना अत्यधिक कम हो जायेगी।

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