गूंजते रहे जय श्रीराम के नारे, जलती रही दिल्ली!

नई दिल्ली– पिछले रविवार से जारी दिल्ली के उत्तर पूर्वी में हिंसा के दहकते अंगारे भले ही खामोश हो गए हों लेकिन उसे नजदीक से देखने वालों के दिल की धड़कने अब भी तेज है। हिंसा को कवरेज करने गए संवाददाताये भी सहमे हुए हैं।

दंगाइयों ने पत्रकारों के साथ जिस प्रकार का व्यवहार किया यह आजाद भारत के इतिहास में पहली बार हुआ। दंगा की फुटेज ले रहे कैमरो को तोड़ दिया गया मोबाइल से रिकॉर्ड किए गए वीडियो को उड़ा दिए गए, दंगाई मोबाइलों का फुल फॉर्मेट कर देते थे। जो लोग इसका विरोध करते उनका मोबाइल तोड़ दिया जाता था।

दंगे की कवरेज कर रहे संवाददाता बताते हैं कि जय श्रीराम के नारे लग रहे थे और उनके सामने ही दिल्ली जल रही थी दंगाई उन्हें उनका काम नहीं करने दे रहे थे, ना ही उनके पास वीडियो शूट करने की परमिशन थी और ना ही फोटो खींचने की छूट।

चोरी चुपके अगर वह तस्वीरें या वीडियो बना भी लेते थे तो दंगाइयों की एक भीड़ उनपर टूट पड़ती गाली गलौज देकर उनके मोबाइल या कैमरे से फुटेज डिलीट कर देते थे। संवाददाताओं ने बताया कि दंगाई उनसे भी जबरन जय श्रीराम के नारे लगवा रहे थे।

अगर सरकार और कारपोरेट घराने की मीडिया की बात माने तो यह हिंसा नागरिकता संशोधन कानून के विरोध और समर्थन करने वाले लोगों के बीच हुई। दंगाई लोगों की पहचान कर उन्हें पीट रहे थे। मुसलमानों के मस्जिदों समेत उनके घरों को आग के हवाले कर रहे थे। उनकी दुकानों को जला रहे थे।

चांदबाग, भजनपुरा, गोकुलपुरी, मौजपुर, करदमपुरी और जाफराबाद दंगाइयों के दहशत से कांप रहा था. “जय श्री राम” का पवित्र नारा देश की राजधानी में दहशत का पैगाम दे रहा था। प्रत्यक्षदर्शी दिल्ली पुलिस की खामोशी पर हैरान थे। एक बार तब वे चौक गए जब दिल्ली पुलिस दंगाइयों का साथ देती दिखी।

दंगाई असलहे के साथ धारदार हथियारों और लाठी-डंडों से लोगों पर हमला कर रहे थे ईंट पत्थरों से उन्हें जख्मी कर रहे थे जबरदस्ती उनसे जय श्रीराम के नारे लगवा रहे थे। दंगाई देश की राजधानी दिल्ली में दिन के उजाले में इस हिंसा को अंजाम दे रहे थे।

हिंसा में 40 से अधिक लोगों की मौतें हुई है और 200 से ज्यादा लोग घायल हैं। घायलों का इलाज दिल्ली के अस्पतालों में किया जा रहा है। दिन प्रतिदिन मृतकों के आंकड़ों में इजाफा हो रहा है।

ज्यादातर मौतें गोली लगने और धारदार हथियारों से हमला करने से हुई है। कई लोगों की मौते हिंसा की दहकती आगों में झुलस कर हुई है। सब की मौतों की एक दर्दनाक कहानी है। मृतकों के परिवार यह दुख ताउम्र नहीं भूल पाएगा।

दंगाई, लोगों की पहचान उनके नाम पूछ कर कर रहे थे। शक होने पर हनुमान चालीसा और गायत्री मंत्र पढ़ने को कह रहे थे साथ ही जय श्रीराम के नारे लगवा रहे थे। अंत में सत्यापन करने के लिए उनके पैंट खोलकर चेक कर रहे थे। हिंदू होने पर उन्हें छोड़ दिया जाता और मुस्लिम पाए जाने पर उनकी जान ले ली जा रही थी।

दिल्ली में हुए इस निंदनीय कृति पर सरकार की खामोशियां उनके नीतियों पर सवालों के अंबार खड़ा करती है। देश के बिगड़ते हालात को न रोक पाने में केंद्र की सरकार असफल है। एक स्वस्थ समाज और एक उदार लोकतंत्र के लिए सरकार को इस असफलता पर उसे इस्तीफा दे देना चाहिए।

हमने पिछले कुछ वर्षों में देखा है कि मौजूदा सरकार के चैप्टर से इस्तीफा का सिलेबस गायब हो चुकी है। घटनाओं का क्रम चाहे कितना भी भयावह क्यों न हो जिम्मेदार कुर्सी पर बने रहते हैं।

जय श्री राम का नारा लगाकर दंगा कर रहे दंगाइयों पर सरकार की संरक्षण और निर्दोषों को जेल में ठूसा जा रहा है। दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र खतरे के निशान से ऊपर चल रहा है। खामोश सड़के या बस्ती कब हिंसा की भेंट चढ़ जाएगी इसका अंदाजा कोई नहीं लगा सकता।

2020 की दिल्ली हिंसा 2002 के गुजरात दंगों की यादों को ताजा करती हैं। 2020 का देश का मुख्य मुखिया 2002 में गुजरात का सीएम था। वर्षों में डिजिटो का परिवर्तन और पदों में सीएम से पीएम एक खासा संयोग है या प्रयोग!

बात चाहे जो भी हो लेकिन दिल्ली वास्तव में जली है। जिसकी जिम्मेदारी मौजूदा सियासतदानों को लेनी चाहिए और अपनी असफलता का प्रायश्चित करने के लिए अपने पदों का त्याग कर देना चाहिए। जिससे एक स्वस्थ व उदार लोकतंत्र दागदार होने से बच सकें!

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