कैसे खेलों की महाशक्ति बनेंगे हम?

संवाददाता: जुल्कर नैन

ओलंपिक खेल हो या वैश्विक स्तर पर बड़े टूर्नामेंट उसमें हमारा प्रदर्शन हमेशा निराशाजनक होता है क्यों? यह सवाल आज से नहीं उठता यह हमेशा यही सुनने को मिलता है। जब इसका उत्तर खोजा जाता है तो खिलाड़ी बुनियादी सुविधाओं को वजह बताते हैं।

तब देशवासी निरूउत्तरीत हो जाते हैं। मगर इसके सबसे उत्तरदायी सरकारें होती हैं चाहे वह किसी भी दौर की रही हो चाहे वह इस बार की ही सरकार क्यों न हो।

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने शनिवार को अपना पहला पूर्ण बजट पेश किया। जो कि बजट का सबसे बड़ा भाषण था। इस बजट में मध्यवर्ग पर मरहम और आयकर पर राहत के साथ ही किसानों को भी साधा। मगर खेल बजट पर सिर्फ 50 करोड़ की जो बढ़ोतरी की। वह खेल जगत के लिए बेहद निराशाजनक है।

इसी साल टोक्यो ओलंपिक खेलों का आयोजन भी होना है ऐसे में सभी लोग अनुमान लगा रहे थे कि खिलाड़ियों की तैयारी और प्रोत्साहन के लिए सरकार ज्यादा पैसे खर्च करेगी पर नतीजा सिफर (शुन्य) के मुताबिक है।

इस बार सरकार ने खेलों के लिए केंद्रीय बजट 2826.92 करोड़ रुपये आवंटित कराया जबकि 2019-20 में 2776.92 करोड़ रुपये संशोधित बजट मिले थे। मात्र 54 फ़ीसदी खेलो इंडिया यूथ गेम्स के लिए बढ़ाया।

इस खेल बजट पर पूर्व केंद्रीय खेल मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौर ने आपत्ति व्यक्त की है। जबकि 2017-18 में 1938 करोड़ रुपए बजट आवंटित किया था। उस वक्त के तत्कालीन खेल मंत्री ने कहा था कि ‘भारत की जनसंख्या 121 करोड़ है इस लिहाज से खेल मंत्रालय प्रत्येक नागरिक पर तीन पैसे प्रतिदिन खर्च कर रहा है।’

अगर बात करें वैश्विक स्तर पर तो 71 खरब रुपए अमेरिका खेलों के लिए बजट आवंटित किया। चीन 32 खरब रुपए खेलों पर खर्च करता है।

ओलंपिक एशियन गेम्स, राष्ट्रमंडल खेल, विश्व चैंपियनशिप, जैसे बड़े टूर्नामेंट में हमारे खिलाड़ी फिसड्डी साबित होते हैं। जबकि हमारा पड़ोसी देश चीन खेलों की महाशक्ति है।

अपने देश के मुकाबले चीन रूस अमेरिका इंग्लैंड जापान जैसे देश खेलों पर अरबों रुपए खर्च करती हैं। जबकि हमारा देश भारत अपने देश के खिलाड़ियों पर प्रतिदिन 3 पैसे खर्च करती है तो वहीं चीन 6.1 पैसे खर्च करती है।

ऐसे में हम अपने सपनों का ख्याली पुलाव ही बना सकते हैं। पदकों को न जीत पाने की निराशा हमेशा हाथ लगेगी। ऐसे में किसी खिलाड़ी को दोषी ठहराना गलत होगा।

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